Monday, January 11, 2021
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कामाख्या मंदिर: देवी के मासिक धर्म के रक्त से यहां लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी

badd3-1491750_1415737252013862_1971858553_n1बेहद खूबसूरत और अपनी एक अलग संस्कृति लिए हुए पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार गुवाहाटी असम का सबसे बड़ा शहर है। ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर स्थित यह शहर प्राकृतिक सुंदरता से ओत-प्रोत है। यहां न सिर्फ राज्य, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र की विविधता साफ तौर पर देखी जा सकती है। संस्कृति, व्यवसाय और धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र होने के कारण आप यहां विभिन्न नस्लों, धर्म और क्षेत्र के लोगों को एक साथ रहते देख सकते हैं। यूं तो इस शहर में घूमने और देखने के लिए बहुत कुछ है और ये शहर पर्यटन स्थलों से भरा पड़ा है परन्तु यदि आपने यहां का रहस्यमय कामाख्या मंदिर नहीं देखा और उसके दर्शन नहीं किये तो समझ लीजिये आपकी यात्रा अधूरी है।

असम राज्य की राजधानी गुवाहाटी एक समृद्ध शहर है, जो ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर बसा है। इस शहर का पौराणिक नाम प्राग्ज्योतिषपुर था। जिसे नरकासुर ने बसाया था। नगर की एक ओर नीलाचल पहाड़ी स्थित है। जिस पर स्थित है मां कामाक्षी (कामाख्या) देवी का विख्याता मंदिर। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है।

देवी भागवत के सातवें स्कंध के अड़तालीसवें अध्kamakhya-deviयाय में लिखा है कि, ‘यह क्षेत्र में समस्त भूमंडल में महाक्षेत्र माना गया है। यहां साक्षात् मां दुर्गा निवास करती हैं। इनके दर्शन-पूजन से सभी तरह के विघ्नों से छुटकारा मिलता है। यहां तंत्र साधना करने वालों को जल्द ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। ऐसी महिमा अन्य कहीं ओर मिलना कठिन है।’

मंदिर जाने के लिए…

मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से पांच किलो मीटर दूरी पर नीलाचल नामक पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ी की तराई में प्रवेश द्वार है। इस प्रवेश-द्वार से ऊपर जाने में एक किलोमीटर की सीधी चढ़ाई, चढ़ना पड़ती है। इसके अतिरिक्त पर्वत-शिखर तक पक्का मार्ग बना है।

प्रवेश-द्वार के सामने ही मिलने वाली मोटर-टैक्सियां देवीपीठ तक पहुंचा देती हैं। समुद्र के जलस्तर से इस देवीपीठ की ऊंचाई 525 फीट है। यह देवीपीठ भूमि के नीचे है। धरातल से सात सीढ़ियां नीचे उतरने और वहां से बाईं ओर से पुनः दस सीढ़ियां नीचे उतरने पर देवीपीठ का दर्शन होता है। यहां कोई मूर्ति नहीं है, बस एक गहरा एक कुंड है, जहां लालवस्त्र से मां का योनीपीठ ढंका रहता है।

यही सिद्धिपीठ है, इसी के दर्शन पूजन का विधान है। दस महाविद्याओं में षोडशीदेवी का ही नाम कामाक्षी देवी है। इसी के पार्श्व में मातंगी (सरस्वती) एवं कमला (लक्ष्मी) दोनों देवियों के पीठस्थान है। मंदिर से उत्तर की ओर सौभाग्यकुंड नामक क्रीड़ा पुष्पकरिणी है।

कहा जाता है इस कुंड को देवताओं ने बनवाया था। मंदिर के पीछे गणेशजी की विशाल मूर्ति है। इसी पहाड़ी पर सात महाविद्यालयों के भी मंदिर हैं। माना जाता है कि कामदेव ने यहां कामाक्षी का मंदिर बनवाकर उनकी आराधना की। इससे देवी प्रसन्न हुईं और कामदेव को दिव्यज्ञान प्रदान किया। इसी कारण इस पुण्यभूमि का नाम कामरूप और देवी का आंदाख्या पड़ा, जिसको अब कामाख्या कहा जाता है।

अनेक वर्षों के कालचक्र एवं भूकंप के कारण यह मंदिर विध्यवस्थ होकर केवल मिट्टी का टीला ही रहा गया था। पुनः इस मंदिर का निर्माण कामरूप के राजा विश्वसिंह ने कराया। इतिहास में उल्लेख मितला है कि सन् 1553 ईसवी में बंगाल के नबाव सुलेमान कररानी के दामाद एवं सेनानायक काला पहाड़ था। उस आततायी का उद्देश्य हिंदू-धर्म का गौरव नष्ट करना था। उसने इस मंदिर के शिखर-भाग को क्षति पहुंचाई एवं उस पर की बनी हुई मूर्तियां को नष्ट किया। इसके पश्चात सन् 1565 ईसवी में इसका जीर्णोद्धार हुआ।550x733xSecrets-Of-Kamakhya-Devi-Temple-Menstruating-Goddess-In-India-4.jpg.pagespeed.ic.ZWIPxY3JHB

कैसे पड़ा नाम कामाख्या ?

एक बार एक श्राप के चलते काम के देव काम देव ने अपना पौरुष खो दिया जिन्हें बाद में देवी शक्ति के जननांगों और गर्भ से ही इस श्राप से मुक्ति मिली। तब से ही यहाँ कामाख्या देवी की मूर्ति को रखा गया और उसकी पूजा शुरू हुई। कुछ लोगों का ये भी मानना है की ये वही स्थान हैं जहां देवी सती और भगवान शिव के बीच प्रेम की शुरुआत हुई। संस्कृत भाषा में प्रेम को काम कहा जाता है अतः इस मंदिर का नाम कामाख्या देवी रखा गया।

देवी जिनसे होता है रक्त का प्रवाह ?

कामाख्या देवी को बहते हुए खून की देवी भी कहा जाता है यहां देवी के गर्भ और योनि को मंदिर के गर्भगृह में रखा गया है जिसमें जून के महीने में रक्त का प्रवाह होता है। यहां के लोगों में मान्यता है की इस दौरान देवी अपने मासिक चक्र में होती है और इस दौरान यहां स्थित ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है। इस दौरान ये मंदिर 3 दिन बंद रहता है और इस लाल पानी को यहां आने वाले भक्तों के बीच बांटा जाता है।  बहरहाल स्त्री का मासिक चक्र और ये मंदिर एक स्त्री की रचनात्मकता को दर्शाता है और ये बताता है की स्त्री ही इस ब्रह्माण्ड की जननी है और हमें उसका सम्मान हर हाल में करना चाहिए।

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